नाट्यालय, रांची और भारती विद्यापीठ, पुणे की संयुक्त टीम ने नासिक में मंचित किया नाटक ‘मोपला 1921’

Photo of author

By Mukesh Ram Prajapati

नाट्यालय (रांची, झारखंड) और भारती विद्यापीठ COFA (कॉलेज ऑफ फाइन आर्ट्स), पुणे की संयुक्त टीम द्वारा प्रस्तुत नाटक “मोपला 1921: द वूम्ब ऑफ साइलेंस” का मंचन नासिक के ऐतिहासिक परशुराम सायखेडकर नाट्य मंदिर में रविवार, 5 जनवरी 2025 को हुआ। प्रस्तुति के दौरान कलाकारों द्वारा ऐसा नाट्य क्षण सृजित हुआ, जिसने दर्शकों को भीतर तक झकझोर दिया।

नाटक के माध्यम से वर्ष 1921 में केरल के मालाबार क्षेत्र में घटित उस ऐतिहासिक त्रासदी को मंच पर जीवंत किया गया, जिसे लंबे समय तक इतिहास के पन्नों में मौन के भीतर दबाए रखा गया। मंचन की शुरुआत से ही प्रेक्षागृह में एक गहरी, तनावपूर्ण शांति छा गई। जैसे-जैसे कथानक आगे बढ़ा, विस्थापन, पीड़ा और अमानवीय अत्याचारों के दृश्य दर्शकों की आँखों को नम करते चले गए।

विशेष रूप से नाबालिगों, गर्भवती महिलाओं और बच्चों पर हुए अत्याचारों के दृश्य अत्यंत मार्मिक रहे। प्रभावशाली प्रकाश योजना, सशक्त पार्श्व संगीत और प्रतीकात्मक दृश्य संयोजन के माध्यम से जब मालाबार की त्रासदी को प्रस्तुत किया गया, तो दर्शकों के बीच सिहरन साफ महसूस की गई। कई दर्शक भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख सके।

नाटक के समापन पर जब निर्देशक रौशन सौरभ शर्मा ने “मौन की कोख” (Womb of Silence) की अवधारणा को उजागर किया, तो पूरा सभागार खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। लंबे समय तक चले स्टैंडिंग ओवेशन ने कलाकारों की मेहनत और प्रस्तुति की गहराई को प्रमाणित किया।

लेखक एवं निर्देशक रौशन सौरभ शर्मा ने बताया कि इस नाटक का उद्देश्य किसी प्रकार का विवाद खड़ा करना नहीं, बल्कि उन पीड़ित पूर्वजों की पीड़ा को स्वर देना है, जिन्हें इतिहास ने भुला दिया। उन्होंने कहा कि रंगमंच सत्य को सामने लाने का सशक्त माध्यम है।

नाटक के निर्माण में डॉ. रंजीत किशोर का योगदान उल्लेखनीय रहा, वहीं स्टेनली ईव के संगीत ने प्रस्तुति को और अधिक प्रभावी बना दिया। श्रेया नागपाल की कोरियोग्राफी और शनाया गायकवाड़ के सह-निर्देशन ने मंचन को सिनेमाई भव्यता प्रदान की।

कार्यक्रम में उपस्थित नासिक के प्रबुद्ध रंगमंच निर्देशकों, विश्वविद्यालय के इतिहासकारों और मुख्य अतिथियों ने इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि रांची, झारखंड से आकर नासिक के मंच पर इस ऐतिहासिक सच को इतनी निर्भीकता से प्रस्तुत करना साहसिक और प्रशंसनीय कदम है। उन्होंने कहा कि इतिहास पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन पीड़ितों की पीड़ा और उनके साथ हुआ अन्याय आज भी न्याय और पहचान की प्रतीक्षा कर रहा है।

भारती विद्यापीठ पुणे और नाट्यालय रांची, झारखंड की इस साझा प्रस्तुति ने यह स्पष्ट कर दिया कि सत्य को अधिक समय तक दबाया नहीं जा सकता और रंगमंच आज भी समाज को आईना दिखाने की क्षमता रखता है।

Leave a Comment