जागा रे झारखण्डी – संजय कुमार महतो

जागा रे झारखण्डी

जागा रे झारखण्डी भाइ- बहीन अबरी जागा,
कते दिन सुतल रहबे आपन हक खातिर भागा ।

लोक बेस बुइझ घरें देल्ही बाहरियाक ठांव ,
घर त बनाइबे करलो आरो बनवलो गांव ।

काका जेठा भाइ दादा कहिके लेलो फुसलाइ,
आर तोहुं हले अइसने सइले देलो तोरा बहराइ ।

ऊ तोर कमजोरी के बेस भाभे देखल हो ,
तोर गोतिया के आपन संगे मेसवल हो ।

तोर आपने बाप काकाक मांझे लड़वल हो,
बहारियाक बात सुइन तोरा भिनवल हो ।

ऊपरेक साहेब बइनके तोरा नचाइ रहल हे ,
बा रे झारखण्डी तोंय ओकरा देख रहल हे ।

हां रे झारखण्डी की तोर मगजे नाइ ढुकल हो ,
तोर अरजल टा खायके सोसन कइर रहल हो ।

उठ जाग झारखण्डी आबरी त नजइर खोल ,
कुछु त सीख आर जान जे बाहरियके हो झोल।

कते सुतबे आर उठवतो के जाग आर जगाव,
ढ़ेइर दिन खाये राज करलथुन आब त भगाव ।

कवि – संजय कुमार महतो ।

Leave a Comment