माहंगा – मानिक कुमार

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By Krishna Kunal

माहंगा

दुनियादारीक अइसने चिंता फिकिर ,
एकर खातिर कते खिचीर फिचिर ।

चाइरो बाटे लोक भिखनाइल हथ
केव कम त केव बेसी धराइल हथ ।

हेवइ बोड़ घारेक ढेइर खुसी हांसी
एकर जालाञ गरीब रहथ उपासीं।

गोटे दुनिया हथ तोर से परेसान
कुछु त किरपा करा हे भगवान ।

हियां जखन से तोंय आइल हें
गरीबेक पेटे लाइथ मारल हें ।

हमनी गुजर बसर कइसे करब
छोड़लिये कतेक मेला आर परब ।

गीदर बुतरूक अलगे जाला
खेती बारी मारय अइसने पाला ।

हे ऊपर वाला तनिको करा भला
आर नाइ पारब लाय फुलेक माला ।

कवि- मानिक कुमार

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