विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग में शनिवार को स्वामी विवेकानंद सभागार में दिशोम गुरु शिबू सोरेन व्याख्यान माला का शुभारंभ किया गया। प्रथम व्याख्यान का विषय” शिक्षा के वर्तमान मुद्दे और परिप्रेक्ष्य” रखा गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए झारखंड राज्य के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री श्री सुदिव्य कुमार ने कहा कि दिशोम गुरु के जीवन और आंदोलन में महात्मा गांधी के छाप परिलक्षित होते हैं। उन्होंने कहा कि गुरुजी को औपचारिक शिक्षा कक्षा 8 तक की ही थी परंतु उन्होंने अपने कर्म से इतनी ख्याति प्राप्त की आज उनके नाम पर व्याख्यान माला गठित की गई है। उन पर अध्ययन एवं शोध हो रहे है। गुरुजी के नाम पर व्याख्यान माला प्रारंभ करने पर मंत्री जी ने विश्वविद्यालय की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि वह अपने आप को गौरवान्वित समझ रहे हैं कि इसके उद्घाटन व्याख्यान की अध्यक्षता करने का उन्हें सौभाग्य प्राप्त हुआ है।
उत्कृष्ट हिंदी में अपना संबोधन करते हुए मंत्री जी ने सबका दिल जीत लिया। उन्होंने अंग्रेजी के शब्द ‘स्टडी’ और ‘लर्निंग’ पर बताया कि यह शिक्षा के दो अलग-अलग पहलू है। स्टडी का संबंध जहां सिद्धांत पक्ष से है वही लर्निंग का सीधा संबंध प्रज्ञता से है। डिजिटल प्रविधि की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि चैट-जीपीटी और जेमिनी-एआई से आज कोई भी प्रश्न के उत्तर तुरंत उपलब्ध हो जाते हैं। उन्होंने सावधान किया कि कई अवसर पर इस उत्तर के स्रोत का सत्यापन नहीं हो पता है। इससे ज्ञान सीमित होती है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि उन्हें विषय से संबंधित प्रश्न जरूर पूछने चाहिए।
बतौर मुख्य वक्ता कार्यक्रम को संबोधित करते हुए इग्नू के पूर्व कुलपति प्रोफेसर रविंद्र कुमार ने कहां की ज्ञान का विसरण करना शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है। परंतु ज्ञान क्या है, यह स्पष्ट होनी चाहिए। इस संबंध में उन्होंने उत्तर भारत के वैदिक परंपरा और दक्षिण भारत के अगस्त मुनि की परंपरा का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि अगस्त मुनि की परंपरा में ‘अनुभव’ और ‘रचनात्मकता’ की प्रधानता होती है। उन्होंने आगे बताया कि इसका सबसे महत्वपूर्ण भाग है कि इस ज्ञान का उद्देश्य है समाज का कल्याण। इस अर्थ में अगस्त मुनि की परंपरा आधुनिक डिजिटल युग से बहुत अधिक मेल खाता है।
उन्होंने आगे बताया कि ज्ञान कभी भी ठोस रूप में नहीं हो सकता। ज्ञान की प्रकृति ‘डायनेमिक’ रही है। अतः तरलता इसका गुण है। उन्होंने बताया कि उत्तर में जहां ज्ञान का संप्रेषण अनुशासन से जुड़ा हुआ है वहीं दक्षिण में यह रचनात्मकता पर आधारित है। उन्होंने बताया कि शिक्षक को यह ध्यान में रखना चाहिए कि उनके विद्यार्थी सक्षम बने, बेहतर समाज का विद्यार्थी बने और जिस रूप में शिक्षक ने उन्हें पाया था उससे बेहतर स्वरूप में उन्हें विदा करें।
विनोबा भावे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो चंद्र भूषण शर्मा ने बताया कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन बड़े कद के व्यक्ति थे। उन्होंने संघर्ष किया और बहुत लोगों के जीवन में बदलाव लाया। इस प्रकार वह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, एक विचारधारा बने। कुलपति ने बताया कि 4 अगस्त 2025 को गुरुजी चले गए। परंतु विश्वविद्यालय ने मन बनाया कि हम उनको हजारों वर्षों तक जीवित रखेंगे। इसके लिए उनके विचारों को जीवित रखना होगा और इसी उद्देश्य से यह व्याख्यान माला प्रारंभ की गई है। उन्होंने बताया की कार्यक्रम की अध्यक्षता एक ऐसे व्यक्ति कर रहे हैं जो ना केवल इस राज्य के उच्च शिक्षा के मंत्री हैं बल्कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन के साथ लंबा समय बिताए हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि दिशोम गुरु पीठ की स्थापना में मंत्री जी का पूर्ण सहयोग विश्वविद्यालय को प्राप्त होगा।
कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्य विनोबा भावे तथा दिशोम गुरु शिबू सोरेन के चित्र पर पुष्प अर्पण के साथ हुआ। छात्रकल्याण संकायाध्यक्ष डॉ विकास कुमार ने स्वागत संबोधन प्रस्तुत किया। डॉ पुष्कर कुमार पुष्प ने कार्यक्रम का संचालन तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इस अवसर पर अर्थशास्त्र विभाग के प्राध्यापक डॉ उमेंद्र कुमार सिंह की पुस्तक का लोकार्पण शिक्षा मंत्री, कुलपति एवं अन्य मंचासीन विशिष्ट जनों के द्वारा एक साथ किया गया। स्वामी विवेकानंद सभागार में विश्वविद्यालय के अधिकारी, विभिन्न विभाग के शिक्षक शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित हुए।




