युवाओं में केवल ज्ञान और कौशल नहीं, मूल्य का भी विकास करना होगा : स्वामी भावेशानंद

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By Mukesh Ram Prajapati

विनोबा भावे विश्वविद्यालय के स्वामी विवेकानंद सभागार में विवेकानंद जयंती पखवाड़ा के अवसर पर सोमवार को एक समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ स्वामी विवेकानंद के चित्र पर पुष्प अर्पण तथा दीप प्रज्वलन के साथ किया गया।

मुख्य वक्ता रामकृष्ण मिशन रांची के सचिव, स्वामी भावेशानंद जी महाराज ने तीन बार ओमकार के साथ अपने संबोधन को प्रारंभ किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार भारत विश्व गुरु था। बताया कि नालंदा विश्वविद्यालय में उस समय 82 राष्ट्रों से 9000 से अधिक विद्यार्थी एक ही परिसर में रहकर शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। नालंदा में इतनी पुस्तक थी कि उसे जलने में 9 महीने लग गए। परंतु 1000 वर्षों के विदेशी आक्रमण और शासन ने सब कुछ बदल दिया। ऐसे ही भारत में जब विवेकानंद का जन्म हुआ तो वह भारत की स्थिति को देखकर काफी आहत हुए । उन्होंने कन्याकुमारी में उस पत्थर पर जाकर भारत की ओर मुख कर के ध्यान किया जिस पत्थर को आज विवेकानंद रॉक के नाम से पूरा विश्व जानता है । और वही उनकी दिव्य दृष्टि से उन्होंने देखा कि भारत फिर से प्रगति करेगा और बहुत प्रगति करेगा।

स्वामी भावेशानंद ने बताया कि आज भारत दुनिया का सबसे युवा राष्ट्र है क्योंकि सबसे बड़ी युवाओं की आबादी भारत में है। युवाओं को इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि क्या सही है, क्या गलत। इसी विषय की ज्ञान शक्ति में परिणत होगी। यह ज्ञान इच्छा शक्ति से आएगी। स्वामी जी ने सावधान किया कि केवल ज्ञान से और कौशल से बात नहीं बनेगी। मूल्यों का भी विकास करना होगा। रावण में, दुर्योधन में ज्ञान और कौशल की कमी नहीं थी परंतु उनमें मूल्य का विकास नहीं हुआ था।

उन्होंने स्वामी विवेकानंद की बातों को दोहराते हुए कहा कि शिक्षा वह है जिससे चरित्र का निर्माण होता है, बुद्धि का विकास होता है, मस्तिष्क की शक्ति में वृद्धि होती है और जिसके बल पर व्यक्ति स्वावलंबी बनता है। ऐसे ही शिक्षा से आत्मविश्वास का विकास होता है।

उन्होंने बताया कि भारत के सामने अभी तात्कालिक लक्ष्य है भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना। स्वामी विवेकानंद के विचारों को आत्मसात करके हम इस लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। इसमें सबको अपने हिस्से का योगदान देना है।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो चंद्र भूषण शर्मा ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने जब शिकागो में “सिस्टरस एंड ब्रदर्स ऑफ़ अमेरिका” कहा तो ताली बजने लगी। और वह ताली की गूंज आज भी सुनाई देती है। विवेकानंद ने वहां जो बात कही वह कहने का साहस भी उन्हीं में था। जब वह हवा के विपरीत जाकर खड़े होने का साहस दिखाएं, तब पूरी दुनिया ने उनका लोहा माना। हमारे विद्यार्थियों को भी सही के लिए, सच्चाई के लिए हवा के विपरीत चलने का साहस करना होगा। इसके लिए सबसे पहले उठना होगा। फिर जागृत होना होगा और तब तक प्रयत्न करते रहना होगा जब तक सफलता हाथ ना लगे।

कुलपति ने कहा कि जब विद्यार्थी उठ जाएंगे, जागृत हो जाएंगे और प्रयत्न करना प्रारंभ कर देंगे तब शिक्षकों की जिम्मेदारी शुरू होगी। ऐसे विद्यार्थियों के लिए शिक्षक भी सब कुछ करने को तैयार रहते हैं।

कुलपति ने कहा कि भारत की नीति पर दुनिया चलने लगी और हम ही अपनी नीतियों को भूल गए। हम गलत के खिलाफ खड़ा होते थे। अब हम इसे भूल कैसे गए ? भारत ने हीं दुनिया को चरित्र का पाठ पढ़ाया पर आज हम अपने यहां चरित्र निर्माण की चर्चा कर रहे हैं।

भारत की सबसे बड़ी शक्ति थी भारत का विशाल ज्ञान का भंडार। हमने जीवन के हर क्षेत्र में दुनिया को ज्ञान की रोशनी दी।

उन्होंने कहा कि मेरे निर्णय को देखो और परखो। यदि तुम्हें सही लगे तो उससे सीखो। सवाल जरूर पूछो, परंतु अर्थहीन सवाल नहीं।

स्वामी विवेकानंद युवा महामंडल के श्री गजानन पाठक, श्री धर्मेंद्र सिंह, दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक डॉ राजकुमार चौबे तथा यूसेट के डॉ अरुण कुमार मिश्रा ने भी सभा को संबोधित किया।

कार्यक्रम के अंत में प्रश्नोत्तरी सत्र का आयोजन किया गया तथा पिछले दिनों आयोजित भाषण प्रतियोगिताओं के विजेताओं को कुलपति प्रो चंद्र भूषण शर्मा द्वारा प्रमाण पत्र तथा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मां संगीतायन संगीत महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने भक्ति गीत से समां बांधा।

कार्यक्रम का संचालन डॉ मृत्युंजय प्रसाद ने किया। स्वागत संबोधन डॉ सुबोध कुमार सिंह ने प्रस्तुत किया।

विभिन्न विभाग के विद्यार्थी एवं शिक्षक अच्छी संख्या में उपस्थित हुए।

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