मानुसेक सक्ति – रमेश कुमार

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By Krishna Kunal

मानुसेक सक्ति

हे मानुस! बुझ नाञ् –
तोंञ् आपन के हीन,
उठ–उठ,जाग–जाग –
आपन के तोंञ् चिन्ह|

      मानुस लागे तोञ् -
      काहे होवे - हेजोमारा? 
      नजइर गाडाय देख,निजे -
      केउ नाञ् तोर पारा |

तोर गातेक आइगे –
होवे पारे पहार धूरा |
तोर मगजेक धार देइख –
लाजे पराइ जितो छूरा |

     तरींगन अइसन अकासे -
     तोञ् पारे -- झलके, 
    अइसन काम करें, जइसे -
     मानुसेक समाज चमके |

अंगे – गाते- मने जगाव –
बोल – बुइध – भोरोसा,
तभी पूरा हवत सभे –
पुरखाक देखल -आसा |

          जी- जान, तन--मन से
          लगाव हियाक जोर, 
          आवेक दिने पूरा हतो -
          सब सपुन देखल तोर।

कवि – रमेश कुमार

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