( ससुरघारें )
बाप तोञ हमरा एक छोटो से,
पाली-पोसी काहे करले अपन से दूर।
कुछ दिन आरो राखतली आपन पास,
हमनी सब मिली रहतलो, अब एहे हे आस।
ई घार अब नाञ रहाल अपन,
सब कुछो देखी हाम आइबो तखन।
बाबा खुबे आद आवो हो अपन गाँव,
सोंची सोंची रोहो हो, देखो हो आस ।
काहिया आइबे तोहनी हमरा लिएल,
हांसी-हांसी जीबाए संगी-साथी से मिलेल।
नदी-नदी भेट भेवे मनतुक हमनी नाञ,
जखन ऊ आवे तखन हाम नाञ।
एके गो करमा परब भेवो हे,
जे सब बहिन, संगी-साथी मिले पावो हो।
करमा परबे तोञ दादा लिये अहीए जरूर,
तखने संगी-साथी मिली खेलबाए झूमइर।
सात दिनेक करमा परब दादा लगाएबे झूमइर,
भूली दुख, हांसी-खुसी रहब तोर घरें।
सराई जिताए सात दिनेक करमा परब,
आए जितए लेगेल, हमरा ससुर घारेंक लोक।
बासी भात खियाए दादा कारिहे बिदाई गो,
घूरी भादार मासे दादा आनिहे लियाए गो।
✍अंजनी कुमारी

